कुसुमित भऎ पराग
की सुरभि से ।।
उसपे मुमाखी झूम झूम
चूसे आसव पराग से।।
प्रीति ऐसे पुष्प की।।
जैसे मुस्का रहा।।
आज की बाग कीे बागवां।।
भ्रमर अपनी राग छेड़ रही।।
पुष्प की घनेरे
उस बगिया में फैली।।
डार डार पे सुमन गुच्छ
पवन के मंद मंद
वेग पे थिरकते
वो माला गूँथा ।।
दिल में सुहाना।।
लागे बगवन।।
मन खिला खिला।।
जाने देख उपवन।।
चांद ही चांद
सजे नयन दर्पण।।
तारे कतार में
अजूबे करे तर्पण।।
सायं की बेला
अरुण ढलान पर
आम्र टिकोरा गिडे़ पड़े।।
रात की चांदनी
में ऐसे कैसे।।
बीती रात नैन खुले खुले।।
नदियां की धारा हिल्कोरे।।
कर्ण में मधुर
तानी रस घोले।।
कोयल की मिठास
वृंदावन की महारास लगे।।
मानो हर दिशा
में प्रीत जगे।।
मुख मंडल की आभा पे।।
खुशियों की झलक
साफ दिखे।।
चली मंद मंद
पछुआ की बयार
शहद सी निन्दिया
में कुसुम सुरभि
पास लगे।।
जड़ से चेतन तक
प्रीत खास लगे।।
चटकीले तितलियाँ
उर्ध्वाधर कतार
में फूलों के।।
आस पास लगे।।
कुसुमित भए पराग
की सुरभि से।।
उसपे मुमाखी झूम झूम
चूसे आसव पराग से।।