कर अश्रु से श्रृंगार मुझे।।
नैनन में पलकों के
ऊपर - नीचे।।
कारी - कारी बदरा
घोर घनेरे।।
मस्त भी है पर
कैसे बदरंगे।।
मधुर स्वरूप
को शत - शत
दर्शाती ऐसे जैसे ।।
विची संग मुझे।।
अनेकों रेखाओं को
किरणों में समेटे।।
उन अनंत ब्योम
के ओट में।।
विरह की भंगिमा
मिलता ही रहता ।।
उसके अनादि प्रतिफल में
इसकी बूंदें कितने
निराकार दिखे तुझे।।
करता उस छवि को
स्वीकार तुझे।।
बृहद् जिगर में अश्रु
की अमर बिन्द।।
वेदनाओं की असीम
स्वर तरंग मंद।।
सुमधुर ख्वाब स्नेहिल
चीर प्रतिद्वंद।।
हर फलक में
तेरा भाव संबंध।।
करता रहता आबंध।।
अश्रु के विस्तार
उस संरचना का
ऐसा लगता अखंड
स्नेह तुझे।।
यही पल सरस
का साकार मुझे।।
नम पलकें यू
ही कुन्द- कुन्द
बिखर गए मोतियों
के अनेकों पीस
महत्तम के पोर पर।।
तौल ले सांस
पुष्प की सौरभ पर।।
नप ले संगीत
बिन मांगे चली
ऐसी चाल
करुणा का कर तार - तार।।
कक्षा तो क्षणिक था।।
पर सांसारिक
बंधन पर ध्यान ज्यादा था ।।