विज्ञापन

चक्षु के माध्यम

Dobish Warekar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चक्षु के माध्यम।।
        
                                                    
                            
आत्मभारित ज्ञान मद्धिम।।
ज्ञान और वैराग अहम।।
कर्ण के छिद्र से होकर
ध्वनि स्पर्श करता चर्म।।
प्रति ध्वनि परब्रह्म का सुन।।
उस और दे न।।
पाता ध्यान।।
केंद्र के मध्य
बिंदु रूपी ज्योत।।
उस अनंत संरचना
में ओत प्रोत।।
भीतर से बाहर
उन अनंत में।।
कई विशेषताओं
की भ्रम।।
संज्ञा पे संज्ञा सजी।।
दिखता इधर उधर
कहीं नहीं ।।
अनंत उस ब्योम में।।
इतनी सूक्ष्म।।
इस देह में दिखता।।
किधर है
कोई उसे क्यों
नहीं दिखाता।। चक्षु के माध्यम।।
आत्मभारित ज्ञान मद्धिम।।
ज्ञान और वैराग अहम।।
कर्ण के छिद्र से होकर
ध्वनि स्पर्श करता चर्म ।।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Parul Bhaktani

1636 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13438 कविताएं

View Profile