विज्ञापन

हर बार तुम्हें खोया मैंने

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर बार तुम्हें खोया मैंने
        
                                                    
                            
खोकर तुझको रोया मैंने
लडियां यादों की टूट गईं
जी भर के तब सोया मैंने.

पत्तों सा टूटा बिखर गया
तूफान से मिल निखर गया
जब भी लहरों से टकराया
मंजिल को तब खोया मैंने.

घाटों से नजरें मिली नहीं
लहरों सी किस्मत बही नहीं
तिनकों सा भंवरों में घूमा
नहीं कोई ठिकाना पाया मैंने.

हर समय हाथ आ फिसल गया
दुर्भाग्य देख दिल दहल गया
पथ पर काटों से उलझा इतना
धोखा प्रति पग खाया मैंने.
-दिनेश चौहान
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Parul Bhaktani

1636 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13423 कविताएं

View Profile