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अब कैसा आचार करे

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आओ बौछारों में भींगे सावन का मनुहार करें
        
                                                    
                            
प्रेम सिक्त हों भाव हमारे धरती का शृंगार करें.

दलदल मिट्टी कण कण सिंचित जल रेखांकित
टेर दादुरों की मन उत्कंठित कर व्यवहार करे.

घन आच्छादित व्यथित गगन चिंतित चातक
चमक चमक दामिनी भी वैचारिक संहार करे.

निर्जन वीथिका जल कोलाहल बना हलाहल
सूने मन में शोर कुपित कर शान्ति आहार करे.

दूत मेघ नहीं बनते अब संवादों का अंत हुआ
मावस की काली रातों में अब कैसा आचार करे .
-दिनेश चौहान
एक महीने पहले
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