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सत्य निकेतन नहीं: मृत्यु निकेतन

Dhirendra Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            *सत्य निकेतन नहीं: मृत्यु निकेतन*
        
                                                    
                            
मदहोशी में रहने वाले,
भाँग–धतूरा चखने वाले,
नशा तुम्हें है
दौलत का
अहंकार का,
मस्तिष्क में बैठे विकार का।
कभी देखा है!
मृत्यु का मंज़र
तड़पन,धड़कन
अपनों का विलाप
सूना संताप,
आपा –धापी सही नहीं
मानवता रही नहीं
मौत को
बेमौत मारते
जीतने वाले
कैसे हारते?
कभी देखा है!
बुझते किसी घर का चिराग
अपने ऊपर लगे
कैसे? मिलाओगे दाग़
कभी तुम सोचना
खून के कतरे देखना
देखना टाँग टूटी,फटी जूती
दिखेगा वीभत्स दृश्य
टूट जाएंगी विलासिता की बुनियाद
कभी देखा है!
मलबों में भ्रष्टाचार की निशानी
दफ़न हुई जहाँ
युवकों की जवानी
नयन बनते अश्रु झील
क्या तुम चाहते हो उन्हें नोचें चील
कभी देखा है!
किसी माँ –बाप का श्रवण
तपते जीवन का श्रमण(मेहनत करने वाला)
देख लो! देख लो! दिल्ली स्थित
सत्य निकेतन नहीं – मृत्यु निकेतन
पॉंच मंजिला ऊँची मीनार
दे गई सबको खार( काँटा)
सितंबर सात दो हज़ार छब्बीस
"धुरंधर" हर बार देखे कैसी – कैसी टीस।।
-धीरेन्द्र सिंह"धुरंधर"
 
एक महीने पहले
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