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शिक्षा व संस्कार

Devendra Mani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक का नाम शिक्षा, दूसरे का संस्कार ।
        
                                                    
                            
शिक्षा फल देती है, संस्कार जड़ देता है
शिक्षा कहती देखो कीतनी ऊंची हूँ।
संस्कार कहता है देखो कितना गहरा हूँ।
अच्छा है, ऊंचा होना,
पर गहरा होना है और जरूरी ।
आंधी में ऊँचे पेड़ पहले गिरते हैं,
गहरे पेड मजबूती से जमे रहते है।

बेटे ने टॉप किया, माँ ने मिठाई बाँटी,
पर उसी बेटे ने जब कहा -
"माँ तुम कुछ नहीं जानती"
तो मिठाई कड़वी हो गई।
यही है संस्कार विहीन शिक्षा।
संस्कारी शिक्षा तो वो है
जो बेटे को कहे ,बेटा टॉप तो कर,
पर पहले इंसान बन।
क्योंकि दुनिया को, टॉपरों से ज्यादा ,
अच्छे इंसानों की जरूरत है।

शिक्षा ने उन्हें आई ए एस - आई पी एस , एम एल ए एम पी तो बना दिया,
पर संस्कार ने उन्हें इंसान नहीं बनाया,
इसीलिए वर्दी तो है,पर वर्दी में दर्द नहीं। कुर्सी तो है ,पर कुर्सी में करुणा नहीं है।
और जब नेता और अफसर दोनों,
संस्कारहीन हो जाएं,
तब समाज एक बाजार बन जाता है,
जहाँ ईमान बिकता है, धर्म बिकता ,
और अंत में देश बिकता है।
कुर्सी और कलम तो एक दिन छूट जाएगी,
पर दुष्परिणाम तो देश भुगतता है।
 
4 दिन पहले
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