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जहाँ मौन ही मंत्र है

Devaki Nandan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है —
        
                                                    
                            
ऊष्मा हमेशा गर्म से ठंडी ओर बहती है,
और समय के साथ हर व्यवस्था में,
अव्यवस्था बढ़ती है।
अव्यवस्था माने — बिखराव, शोर, अराजकता,
सुव्यवस्था माने — ठहराव, लय, मौन।

नीचे घाटी में जीवन की गति तेज है,
वहाँ उत्सव है, उमंग है, शोर भी है,
और ऊपर हिमालय में ठहराव है,
वहाँ तप है, मौन है, सृजन की कोर है।

तो नियम तो यही कहेगा —
गति हमेशा तेज से ठहराव की ओर बहेगी,
यदि बीच में कोई मर्यादा न रखी जाए।

इसीलिए तो पुरखों ने,
उस ठंडे धाम के चारों ओर,
एक अदृश्य मर्यादा बना रखी थी,
कहा था — यहाँ शंख भी धीरे बजाना,
क्योंकि जहाँ मौन ही मंत्र है,
वहाँ संयम ही सबसे बड़ी पूजा है।

पर जाने-अनजाने हम,
वो मर्यादा ही भूल आए,
हम अनजाने में अपनी वही तेज गति,
उसी ठहरे हुए आँगन में ले आए।

हम कहते हैं — हम उत्सव जगा रहे हैं,
विज्ञान धीरे से कहता है —
मित्र, तुम ऊष्मा को गलत दिशा में बहा रहे हो।

ये पंक्तियाँ किसी पर अंगुली नहीं,
अपने ही मन पर एक दस्तक हैं,
ये किसी का उत्सव भंग करने को नहीं,
बस मौन का मोल समझाने की हक हैं।

यदि किसी कोने में चोट लगे, तो क्षमा,
ये पीड़ा वैर की नहीं, प्रेम की है,
हम सब उसी हिमालय के अंश हैं,
और हिमालय हम सबके हृदय में है।

-देवकी नन्दन
5 दिन पहले
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