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ख़ल्वत

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिस तरफ देखिए सजे हुए बाज़ार से हैं,
        
                                                    
                            
और हम सब यहाँ पर जैसे ख़रीदार से हैं।

जिसे भी देखिए वो उलझा है जद्दोजहद में,
जहाँ में लोग किसी सबब तो बेज़ार से हैं।

यहाँ हर शख़्स जी रहा है जैसे ख़ल्वत में,
और हम ख़ुद ही ख़ुद के ग़म-ख़्वार से हैं।

यूँ तो मिलते हैं कई लोग हमसे मुस्कुरा कर,
मगर हमको ख़बर है वो सभी अग़्यार से हैं।

हम हैं वाक़िफ कि यहाँ कोई नहीं आएगा,
हर आहट पर तेरी आमद के आसार से हैं।

"शमीम" कोई ग़म में शरीक हो उम्मीद न कर,
वो दिन तो जैसे एक गुज़रे हुए अदवार से हैं।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक महीने पहले
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