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अदावत तो नहीं है

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर राब्ता नहीं तो अदावत तो नहीं है,
        
                                                    
                            
तुझ से हमें कोई भी शिकायत तो नहीं है।

बिन तेरे भी लोग जी रहे हैं इस जहान में,
हम ग़मज़दा हों ऐसी भी सूरत तो नहीं है।

कुछ ख़्वाब उल्फ़त में जो हमने सजाए थे,
अब दिल में उनके वास्ते हसरत तो नहीं है।

जीते हैं मुस्कुरा कर हम तेरे बग़ैर भी,
ख़ुश रहने को अब तेरी ज़रूरत तो नहीं है।

राहें बदल गईं तेरी मंज़िल बदल गई ,
इस बात से भी हम को कुदूरत तो नहीं है।

क़िस्मत को अपना मिलना मंज़ूर नहीं था,
टूटा है दिल गर कोई कयामत तो नहीं है।

तेरी निगाह-ए-शौक़ मेहरबाँ नहीं "शमीम",
चेहरे पे मेरे ग़म की इबारत तो नहीं है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
3 सप्ताह पहले
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