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मोबाइल के पीछे छूटता बचपन

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मोबाइल के पीछे छूटता बचपन
        
                                                    
                            

एक समय था,
बच्चों की हँसी घर में गूंजती थी,
आँगन में खेल होते थे,
दोस्तों से मुलाकात होती थी
और परिवार के साथ बैठकर
घंटों बातें होती थीं।

आज वही बच्चा
एक छोटी-सी स्क्रीन में
अपनी पूरी दुनिया खोज रहा है।

मोबाइल ज्ञान का साधन है,
लेकिन जब साधन ही आदत बन जाए,
तो धीरे-धीरे
रिश्ते, खेल, पढ़ाई और बचपन
सब पीछे छूटने लगते हैं।

माँ सामने बैठी है,
बच्चा मोबाइल में व्यस्त है।
पिता कुछ कहना चाहते हैं,
बच्चे की नजर स्क्रीन पर है।
दोस्त पास खड़े हैं,
फिर भी बातचीत
मोबाइल के रास्ते हो रही है।

सवाल मोबाइल का नहीं है,
सवाल है—
क्या हम मोबाइल चला रहे हैं,
या मोबाइल हमें चला रहा है?

बच्चों को मोबाइल से दूर करना ही समाधान नहीं,
उन्हें मैदान दीजिए,
किताब दीजिए,
समय दीजिए,
और सबसे बढ़कर—
अपना साथ दीजिए।

क्योंकि बचपन
रील देखने के लिए नहीं,
जिंदगी जीने के लिए होता है।

 मोबाइल का इस्तेमाल करें,
लेकिन अपने रिश्तों को ऑफलाइन मत होने दें।

 
एक महीने पहले
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