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फुर्सत के पल

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फ़ुर्सत के पल
        
                                                    
                            
जब कभी हथेली पर आ टिकें,
तो उन्हें यूँ ही
बीते दिनों की तरह
फिसल जाने मत देना।

कुछ पल
अपनी ही परछाईं के पास बैठना,
देखना—
कितना कुछ है
जो दुनिया से कहते-कहते
ख़ुद से कहना छूट गया।

खिड़की पर ठहरी धूप में
बीते मौसमों की आहट सुनना,
किसी पुराने ख़त की तरह
मन की तहें खोलना,
और फिर…
फ़ुर्सत से खुद को पढ़ना।

जो ख़्वाब अधूरे रह गए,
उनसे फिर मिलना,
जो रिश्ते पीछे छूट गए,
उन्हें बिना शिकायत याद करना।

कुछ आँसू
आँखों तक आने देना,
कुछ मुस्कान
बिना वजह खिलने देना।

क्योंकि हर वक़्त
दुनिया को समझना ज़रूरी नहीं,
कभी-कभी
ख़ुद को समझ लेना भी
ज़िंदगी की सबसे बड़ी समझदारी है।

और शायद फ़ुर्सत का असली अर्थ यही है—
दुनिया से थोड़ी देर दूर होकर
अपने भीतर लौट आना। 
- देव कुमार पटेल
एक महीने पहले
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