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अकेलेपन में जिंदगी

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये ज़िंदगी भी अजीब है,
        
                                                    
                            
भीड़ में भी तन्हा नसीब है।

सबके पास सब कुछ है यहाँ,
फिर भी हर दिल में एक कमी है यहाँ।

शाम ढले तो यादें लौट आती हैं,
बिना दस्तक के दिल में बैठ जाती हैं।

मैंने सीखा है अकेले चलना,
गिर कर खुद से ही संभलना।

कोई नहीं भी हो तो क्या गम है,
अपना साया भी तो हमदम है।

ज़िंदगी रुकी नहीं, चल रही है,
अकेली सही, पर संवर रही है।
एक महीने पहले
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