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मन फूलों सा महक रहा है।

DEONANDAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन बस फूलों सा महक रहा है;
        
                                                    
                            
अब दिल भी तन में धड़क रहा है।
तेरी परछाई से मैं फुदक रहा हूँ;
जीवन ज्योति पाकर चमक रहा हूँ।।१।।

मन उजड़ा था, तन पिघला था;
एक हृदय था वह भी दहला था।
आश्रय स्थल के छाया में नित्य;
भोला भाला मन यह बहला था।।२।।

अब मुस्कान जैसी मोती भर दे;
हाथ अपनी माथे पर यूं ही धर दे।
कल्पना में स्नेहिल हृदय से हूँ;
चरण स्पर्श कर वंदन करता हूँ।।३।।

मन न जाने कहाँ भटक रहा है;
किस खोज में कहाँ निकल रहा है।
मन बस फूलों सा महक रहा है;
अब दिल भी तन में धड़क रहा है।।४।।

छान रहा हूँ जग अपना जीवन;
किसी काम आ जाए यह यौवन।
सुन्दरता से मन खूब लुभा रहा है;
वह कौन है जो हमें मिला रहा है।।५।।
-देवनन्दन कुमार
2 महीने पहले
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