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ग़म-ए-दौराँ और मोहब्बत

DEEPAK PRAJAPATI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिलों के तार को मेरे ग़म–ए–दौराँ से जोड़ा है,
        
                                                    
                            
सफ़र में इस मोहब्बत के हमें बे–यार छोड़ा है।
भरी आँखों के अश्कों में दिखी तस्वीर है उस की,
अदब से सर झुका कर जिसके आगे सब गँवाया है।
मिले हैं तोहफ़े में हम को फ़ुर्क़त के ही ये साये,
हमारी ख़्वाहिशों का आईना पत्थर से तोड़ा है।
जला के ख़ाक ही कर डाला मेरा आशियाँ उसने,
परिंदा आज बे–घर आसमाँ के रुख़ पे छोड़ा है।
मुक़द्दर में हमारे लिख दी उसने उम्र भर की शब,
सहर का ख़्वाब जो देखा तो पलकों को झँझोड़ा है।
हज़ारों ज़ख़्म खाकर भी रहे हम चुप ही महफ़िल में,
ज़बाँ को सी लिया हमने न शिकवा कोई जोड़ा है।
बने बैठे मसीहा आज मेरी इस तबाही पर,
उन्हीं के हाथ में पत्थर था जब ये शीशा तोड़ा है।
एक महीने पहले
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