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गुनहगार -डी एम मिश्र

डाँ डी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गुनहगार के साथ लाखों खड़े हैं
        
                                                    
                            
सताए हुए लोग तन्हा पड़े हैं

उजालों की तारीफ़ होती नहीं है
मगर उन अँधेरों के चर्चे बड़े हैं

हक़ीक़त उन्हें फिर नज़र कैसे आए
जब आँखों पे लालच के परदे चढ़े हैं

ये फल हैं, मगर फल के जैसे न कतई
बड़े पिलपिले और भीतर सड़े हैं

यही हम दरख़्तों की पहचान, भाई
हवा के मुख़ालिफ़ भी तनकर खड़े हैं

डरे भी नहीं और न मैदान छोड़े
भले हम न जीते, मगर हम लड़े हैं

हमें फ़िक्र उनकी है खुद से ज़ियादा
इरादे हमारे जो हमसे बड़े हैं
- डी एम मिश्र
2 महीने पहले
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