विज्ञापन

देखता हूँ.. (ग़ज़ल)

D. P. Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जगत से नित्य मैं आवागमन को देखता हूँ
        
                                                    
                            
मनुज में फिर भी चारित्रिक पतन को देखता हूँ

कभी धन के लिए करते गबन को देखता हूँ
कभी बिन जेब-झोले के कफ़न को देखता हूँ

मैं डरता हूँ, मिलन की चाह किससे क्या करा दे
क्षितिज पर जब कभी झुकते गगन को देखता हूँ

लहू दे कर शहीदों ने सँवारा था जो उपवन
सियासत में अब उस जलते चमन को देखता हूँ

लुटेरों और चोरों का समय अब लद गया है
प्रहरियों में ही चोरी के चलन को देखता हूँ

प्रगति से अब किसी की इस जगत में कौन ख़ुश है?
कि अब शुभकामना में भी जलन को देखता हूँ

कहीं है आग उदर की तो कहीं पर वासना की
कहीं जबरन हरण होते वसन को देखता हूँ

मनाता हूँ, वो भूले से भी सत्ता में न आएँ
जब उनके हर विषय पर विष-वमन को देखता हूँ

पिताजी और माँ के बा'द अब तो गाँव जाकर
कभी चौखट, कभी सूने भवन को देखता हूँ

निराशा के घिरें जब भी गहन घन हृद्-पटल पर
तभी कुछ दूर आशा की किरन को देखता हूँ
 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11075 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

854 कविताएं

View Profile

Dr fouzia

6944 कविताएं

View Profile