विज्ञापन

ढलने लगी है सांझ उम्र की, कर ले थोड़ा प्रभु सिमरन।।

Chandralata Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आधा जीवन बीत चुका है, हाथ लगा है मात्र ये धन।
        
                                                    
                            
समय गंवाया, शरीर खोया, जलता ही रहता है मन।।

असंतोष की आग है दिल में, ईर्ष्या की है तेज़ तपन।
हवस की भट्टी में झोंक दिया, हमने अपना सुंदर जीवन।।

'पहल कौन पहले कर देगा', इस उलझन में उलझे रहे।
कदम बढ़े न अपनों की जानिब, दूर हुआ हर एक स्वजन।।

न तो बची पहचान कोई अब, न ही रही वो पावन भावना।
भीड़ भरी इस दुनिया में भी, सूना-सूना है आँगन।।

एक ही शहर में रहकर देखो, अजनबी जैसे घूम रहे।
अपनो से मिलने को तरसे, बरस रहे है आज नयन।।

दौड़ रहे थे जिस साए के पीछे, वो तो बस एक धोखा था।
दौलत की इस अंधी चकाचौंध में, भूल गए हम अपनापन।।

वक्त का पंछी उड़ता जाए, हाथ मले हम बैठे हैं।
बीते दिनों की यादें लेकर, रोता है अब अंतर्मन।।

अब तो जाग 'चंद्रिका' तू भी, छोड़ दे ये दुनियादारी।
ढलने लगी है सांझ उम्र की, कर ले थोड़ा प्रभु सिमरन।।

- चंद्रलता यादव 'अरुण'
1 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Dr fouzia

6944 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

854 कविताएं

View Profile

Hari Shankar

7098 कविताएं

View Profile

dinesh chauhan

3631 कविताएं

View Profile