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फिर वहीं लौटता समय

Chandra Makanday

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस दुनिया से दूर कहीं ऊंचे गगन में उड़ चला था,
        
                                                    
                            
जाना कहां है?मंजिल कौन सी इसका मुझे पता न था।
ढूंढ़ रहा था अपना पता मुझको यह मालूम न था,
अनन्त उंचाई में उड़ते उड़ते जाना कहां है पता न था।

फिर याद आई रिश्ते नातों की मुझको सब भूल चुके थे,
जीवन की इन मंजिलों में जाने कितने मुझको सूल चुभे थे।
लौट फिर मुझे वहीं आना था जहां से उड़कर मैं चला था,
जीवन का सच कुछ जाना पहचाना था किसको मुझे अपनाना था?

हर जगह तो कांटे बिखरे थे उन कांटों से मुझे गुजरना था,
अपने बच्चों को पंखों में छिपाकर गिद्धों से मुझे लड़ना था।
उनकी सुरक्षा की थी चिंता मुझको सबको मुझे बचाना था,
लौट चला मैं फिर से वहीं जहां से उड़कर मैं चला था।।

आत्ममंथन की बेला थी खुद को खुद में खोजने चला था,
नियम संयम अनुशासन का मुझमें एक अनोखा संसार भरा था।
संस्कारित करना बच्चों को जीवन में मेरे उद्देश्य खड़ा था,
अपने सुखों का त्याग करना मेरे जीवन में असमंजस बड़ा था।।

फिर मैंने सोचा क्या करना है देना है मुझे बलिदान सुखों का,
मैं फिर लौट चला फिर वहीं आया जहां से उड़ मैं चला था,
सपनों का जो घोंसला बनाया उसी घोंसले में मुझे जाना था।।

आंखों में आंसू खूब भरे थे मेरे सपने सारे टूट चुके थे,
बस हिम्मत अभी बाकी थी दुश्मन हर ओर से मुझे घेरे खड़े थे।
छल कपट छीना झपटी का दौर चला था मैं बेचैन बड़ा था,
लौट फिर वहीं आया जहां से उड़ मैं बहुत दूर चला था।।
 
11 घंटे पहले
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