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मेरी तन्हाईयां- पुरानी डायरी से

Brijmohan Bisht

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ अधूरी ख्वाहिशें, कुछ मेरी तन्हाईयां।
        
                                                    
                            
सफ़र मे साथ चलेंगी यादों की परछाइयाँ।।

जहाँ जाता हूँ लोग मुझे पहचान जाते है।
मुझसे पहले पहुँच जाती हैं मेरी रूसवाईयां।।

आज फिर आँखों में अश्क के दरिया बहेंगें।
उड़कर आ गई है फिर यादों की पुरवाईयां।।

उसने हमारा दिल तोड़ा तो क्या गम साकी।
मशहूर है उसकी शहर मे बेवफ़ाईयां।।

तुम तो अभी से ही मर मिटे हो यार ।
अभी तो ली है उस कातिल ने अंगड़ाईयां।।

गुमनाम हर दिल को न कहो तुम यू नाज़ुक।
कितनी चोट खाई जाने कितनी देखी जुदाईयां।।
          - बृज मोहन सिंह बिष्ट
3 सप्ताह पहले
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