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शिकायत यारों की गुमनाम से कि होश नहीं।

Brijmohan Bisht

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उन हसीं ख्यालों को आने से कैसे रोकू।
        
                                                    
                            
यार बता दिल धड़कने से कैसे रोकू।।

कैसे भूल जाऊँ,कैसे भूल जाऊँ उस नूर को।
चाँद को फलक मे निकलने से कैसे रोकू।।

तलाशता रहा मैं सुकून भरी रातें मगर।
उनके ख्वाबों को महकने से कैसे रोकू।।

हर जर्रा उसका हर चमन मे खुशबु उसकी।
फिर बयार इश्क की बहने से कैसे रोकू।।

आज जो देख लिया उसे एक नजर भर।
अब तन्हाइयों को रात संवरने से कैसे रोकू।।

बरसों बाद मिला तो आँखों मे थे आँसू।।
ज़ज्बात को कमबख्त छलकने से कैसे रोकू।।

शिकायत यारों की गुमनाम से कि होश नहीं।
राहों मे मैंकदा कदम,बहकने से कैसे रोकू।।
               - बृज मोहन सिंह बिष्ट
एक महीने पहले
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