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पर हुआ मयस्सर कुछ भी नहीं

Brajesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            छूने चले थे आसमां
        
                                                    
                            
पर ना रही ज़मीं पैरों तले
जाने आ पहुंचे कहां
जाने कहां को थे चले
रही चलती मुसलसल ज़िंदगी
पर हुआ मयस्सर कुछ भी नहीं
सपने गए अपने गए
ना सुख रहा ना दुःख ही कहीं
बस बुत सा बन कर रह गए
ना साँसें रहीं ना धड़कनें
छूने चले थे आसमां...।
एक महीने पहले
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