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जंग मैं कुदरत और आदमी

brahmanand gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जंग
        
                                                    
                            
जंग में कोई पीछे नहीं रहना चाहता—
न आदमी,
न कुदरत।
आदमी की चाहत
जंग में जीत की है,
मालिकाना हक की है।
वह लड़ रहा है
अपनी ही जाति के उद्भव से,
मानो चैन मिलेगा उसे
कुदरत के पराभव से।
हथियारों और औजारों की जीत के टशन में
अंधा हो गया है आदमी।
कुदरत पर जीत का दावा कर
इतराना, इठलाना,
मगरूर होना—
उसकी फितरत बन गई है।
मगरूर आदमी ने
परवान चढ़ा ली अपनी हसरत।
पहिए से पैराशूट तक,
आग से एटमी मिसाइल तक—
धरती की नसें सुखाने,
उसका दिल दुखाने
आमादा है आदमी।
धरती का चीरहरण करने पर तुला है
अभिमानी आदमी।
सागर की नदियों के पीछे पड़ा है,
अंधा आदमी।
अंबर तक को नहीं छोड़ा,
हवा को जहरीला कर दिया।
नशे में डूबा आदमी
अपनी जिद पर अड़ा है,
बारूद के ढेर पर खड़ा है।
लालच का चश्मा चढ़ाकर,
हथियारों और औजारों पर धार चढ़ाकर
कुदरत को काटने,
सुखाने,
तोड़ने
और अपनी जेबें भरने में लगा है आदमी।
अपनों का क्या,
अपनी जात का भी
सगा नहीं रहा आदमी।
कुदरत की करवट से बेखौफ
आदम की संताने
उसके पलटते ही
कराहने लगती हैं।
जब कुदरत
इस टूट-फूट की भरपाई करने लगी,
तो आदमी की शामत आई।
लगा भागने,
लगा हाँफने—
जन्नत में भी आसरा नहीं,
जहन्नुम में भी नहीं।
भूस्खलन हो,
सुनामी, भूकंप
या ज्वालामुखी—
ग्लोबल वार्मिंग,
ग्रीनहाउस प्रभाव—
कहाँ तक बचाएगा आदमी
अपना सुख?
सार्स हो,
इन्फ्लूएंजा हो,
स्वाइन फ्लू
या कोरोना वायरस—
तोड़ का नहीं मिला कोई क्लू।
आदमी की साँस फूल गई,
साँस टूट गई।
धरती की बेचैनी
कयामत बरपाएगी।
देखना है—
आदमी की साइंस
कहाँ तक
कुदरत पर हुकूमत चलाएगी?
क्योंकि
जंग में कोई पीछे नहीं रहना चाहता—
न आदमी,
न कुदरत।
पर
कुदरत की जंग में
जीत किसकी होगी,
यह तय करना
आदमी के हाथ में नहीं है।
-ब्रह्मानंद गुप्ता 'ब्रह्मपाद'
 
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