मुक्कुट्टी के फूल
साइलेंट मोड में,
मौन सुरों में
लाउडस्पीकरों को शांत कराते हुए
ओणम का उत्सव!
दलित-सम्राट महाबली,
एक ही ठोकर में
पाताल को उतारा गया वह,
सिर्फ़ एक दिन की पैरोल पर
फिर ऊपर आ पहुँचा है
उत्सव के शोर में!
उत्सव के बाज़ार में
हर ओर कृत्रिम फूल,
एक भी पंखुड़ी झड़े बिना,
बिना मुरझाए,
बिना सुगंध के
सजे हुए फूलों के कालीन!
कौन महाबली?
कौन-सा महाबली?
गहनों की दुकानों के सामने,
कपड़ों की दुकानों के द्वार पर,
दिहाड़ी के लिए खड़े हैं
बहुत-से महाबली-छाप चेहरे!
कौन महाबली?
कौन-सा महाबली?
चारों ओर उछलता-नाचता हुजूम,
मदिरा के मद में
मौत के खेल का उत्सव!
लज्जा की खाल उतरती है,
क्रूरता मुस्कराती है...
न्यू-जनरेशन ओणम्!
न्यू-जनरेशन ओणम्!