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एक ओणम-स्मृति : उत्सव की गंध

binoy mb

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे पिता को
        
                                                    
                            
इंडियन-स्टाइल शौचालय से
इतना डर लगता था
कि उनके उस “कुंभ” के लिए
घर का गड्ढेवाला शौचालय ही
सबसे सुरक्षित ठिकाना था।

इसलिए “सद्या”
यानी ओणम की दावत का नाम सुनते ही
उनके भीतर एक डर-सा जाग उठता था।

आज भी
जब कोई कहता है, “ओणम आ रहा है,”
तो फूलों की रंगोली से पहले
स्मृति में उभरती है
वही पुरानी नाटप्पेड़ी —
उस गंध का डर!

न दावत का मोह,
न उत्सव का उल्लास,
बस एक पुरानी स्मृति
नाक पकड़कर खड़ी हो जाती है!
1 सप्ताह पहले
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Pankaj Sharma

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