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तन्हाई का शोर

BIJAY TIWARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुयी गौण जीवन - वृति
        
                                                    
                            
बच गई याद और स्मृति
यादों की जब आती आँधी
रही नही जाती गाँठे बांधी
अनुस्मरणों के बन्धन,पुरजोर दबाता हूँ।
मै याद मिटाता हूँ

देखता जब झरोखे ओर
यादों से बंध जाती डोर
दिल में दफने  अनमने
फड़फड़ाते यादों के पन्ने
अतीत के इन  उथल-पुथल से, मैं घबरा जाता हूं
मै याद मिटाता हूँ

दी हुई , तेरी एकाकी
बेबाकी की देती झांकी
खींच लेता मन तेरी ओर
चीखती तन्हाई का शोर
गूंगी,बहरी गृहमहफ़िल को शायरी सुनाता हूं
मैं याद मिटाता हूं।

एक एक कर छुटे सहारे
बैठ गए हम , उम्र से हारे
दिल में रखकर तेरा नाम
लगता डर, जब होती शाम
सूरज डूबते घर पे मै, ताला लटकाता हूँ ।
मै याद मिटाता हूँ ।।

एकाकीपन बन गया प्रश्न
न गम मनाता हूँ  न  जश्न
बैठा रहता      चौबारे में
सोचता बस   तेरे बारे में  
तेरी आदाये सितारों को रोज बताता हूँ।
मै याद मिटाता  हूँ।।

चर्ममर्र करते ये दरख्त दरवाजे
टुटते तारों के नखड़े और नाजें
जुगनूओं की चमक, झींगुरी आवाजें
हर शाम उठते, तन्हाई के जनाजे
टुटती सांसों से धड़कन को पल पल बचाता हूं।
मै याद मिटाता  हूँ।।

यादों की पोटली ले  सोता सिरहाने
दर्दों को ओढ़ लेता  चादर के बहाने।
सपने देते  खुली पलकों  को  ताने
जो निंद छोड़ लगे हैं  आँसू बहाने।
घुमते वृतचित्र को मैं रोक नहीं पाता हूं
मैं याद मिटाता हूं।

 
एक महीने पहले
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