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पश्चाताप' और "प्रायश्चित"

BIJAY TIWARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्र के इस चौथे दौर में
        
                                                    
                            
कर्म विश्लेषण के तौर में
बीती उम्र,  बनती गवाह
सुकर्म किए  या गुनाह ।।

बीत जाती जब आधी रात
करने कर्म पर वार्तालाप
आ  धमकता  पश्चाताप
छेड़ने संताप व मनस्ताप ।।

बनकर आता वो रसूल
भूल न जाऊं किए भूल
उन बातों को देता तूल
जो तोड़ दिए मैंने कबूल।।

बोलता बनकर  आया दूत
बताने तेरे   किए करतूत
करना पड़ता है सम्मान
कर्म दंड के बने विधान।।

भुगते दंड अवश्यंभावी
राम, कृष्ण सम प्रभावी
पाप दंड का दो संयोग
प्रायश्चित,या दैवीय भोग।।

प्रायश्चित करना अपने हाथ
स्वतप ,कर   घटाते संताप
महाकष्टकारी दैवीय यातना
नारकीय दंडाधिन प्रताड़ना।।

  पूजा पाठ, ध्यान ,सत्संग
  आत्मावलोकन के हैं अंग
  बुरे कर्मों का   अवरोधक
  मैं पश्चाताप मन का शोधक।।
 
  बचा जीवन कुछ ही शेष
  हुए पाप का करो नि:शेष
  दंड वहन की राह विशेष
  प्रायश्चित से,करो श्रीगणेश ।।

पश्चाताप' "प्रायश्चित" का पहला चरण
गुनाहों का , कराता स्मरण
पहले पछतावा,खेद, स्वीकार
फिर सुधार संकल्प,अंगिकार।।
-  विजय बहादुर तिवारी
    
  
एक दिन पहले
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