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बूंदें,बनारस और बहुरिया

BIJAY TIWARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लागातार बरस रही है बारिश
        
                                                    
                            
अपूर्ण गंगातट की ख्वाहिश
है   रोक रखी,    वर्षा ने बाट
सुबह ए बनारस, अस्सी घाट।।

बूंदें ,गंगा जलधारा से  मिल
केलि करतीं  खोलकर दिल
बढ़ता देख    गंगा जलस्तर
जल जमाव, बाढ़ का नस्तर।।

दर्द भरे     लिए शब्दाहार
कविता को देने वाक्याहार
था मौसम, परिदृश्य अनमनी
जा बैठा,    निज  बालकनी।

सामने रहती थी एक बहुरिया
उसका था, परदेश पिया
पिया दरश की प्यासी गोरी
थी रोती रहती चोरी चोरी।।

आँखों से छलकती बूँदे
नभ से टपक रही जलबूंदे
मन, घन की ये बारिश
द्योतक दर्दभरी  ख्वाहिश।

बादलों का टप टप तरंग
आंसूओं का बदलता रंग
घायल  दिल, घन का दर्द
बहती सावनी कविता सर्द।

बीती रात,     हुई विभावरी
मिलन आश में रोती बावरी
अंतिम सावन का  सोमवार
पति इन्तजार में  बैठी द्वार

  बावला बादल,करता गर्जन
  उत्कंठिता को लगता तर्जन
  देख इर्द-गिर्द भटकती बदरी
  तड़प उठती,    यौवन गदरी।।

हो  भिंगी नयनों से  सराबोर
आसमां देखती,कभी राह ओर
जल,थल,वायु किसी पर सवार
मिल जाता उसका बिछड़ा यार।

पगली,बदली का दर्द बतायें
दोनों बूंदे,   बरसतीं   जायें
आंसू उम्मीद,बारिश जीवन
बूंदों में आश का संजीवन।

चहुंओर  हुआ पानी-पानी
दिल दरिया की एक कहानी
बूंद-उपज,दरिया-दिल शब्द
हर जीवन का अलग प्रारब्ध ।।
-बिजय बहादुर तिवारी'विस्मृत'
 
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