विज्ञापन

ना खेल तू मेरे जज्बात से

Bhuneshwar Anant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ना खेल तू मेरे जज़्बात से, खुल जाएगी ऐसी बात,
        
                                                    
                            
खड़ा न हो सकेगा तू, छिपा न सकेगा अपना राज।
ऊँची आवाज़ों से तू सच को दबा न सकेगा,
कितना भी छिपा ले, सच को तू छुपा न सकेगा।

तेरी फ़ितरत ही है दगा,
जिसने तुझे पनाह दी, उसी को दी तूने सज़ा।
अब न फँसेगा कोई तेरी चालों में बार-बार,
समझ ली है सबने तेरी हर अदा, हर वार।

झूठ के महल की नींव बहुत कमजोर होती है,
जिसे तू रुलाता है, उसकी बद्दुआ भी असर करती है।
समझ ले तू मेरी बात, इसे कमज़ोरी न समझ,
ये मेरी खामोशी है, इसे डर मत समझ।

वक्त आने पर हर हिसाब सामने आएगा,
तेरा झूठ खुद तेरे ही सामने आईना बन जाएगा।
तू चाहे जितना अपनी सच्चाई का दिखावा कर,
आखिर सच ही जीतेगा—तू कितना भी उससे बचकर निकल।




                           
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

samarth dalela

2 कविताएं

View Profile

User

2 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13066 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10856 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7356 कविताएं

View Profile