क्यूँ मैं इस समाज की सुनूँ, क्यूँ इसके मुताबिक़ अपनी राह चुनूँ?
क्यूँ दाँव पर लगाऊँ अपनी ज़िंदगी,
क्यूँ इसकी सोच के दायरे में अपने सपने बुनूँ?
मेरी अपनी ज़िंदगी पर क्या मेरा अपना कोई हक़ नहीं?
मेरे ख़्वाबों की उड़ान पर क्या मेरा कोई हक़ नहीं?
बेफ़िक्र होकर फ़ैसले सुनाते हैं जो लोग,
क्या उनके अपने फ़ैसलों में कोई शक़ नहीं?
जब ये नहीं छोड़ सकते अपना अधिकार जताने का,
तो क्यों पीछे हटूँ मैं अपने ख़्वाब सजाने से?
जब अपनी ज़िंदगी जीने का हक़ मेरा भी है,
तो क्यों डरूँ मैं अपने हिस्से का आसमान पाने से?
क्या है ये इज़्ज़त, क्या है ये चरित्र?
क्या हैं ये लोग और क्या हैं इनकी बातें?
क्यों इनके बनाए पैमानों पर तय हो मेरा वजूद,
क्यों इनकी सोच की बेड़ियाँ मेरे ख़्वाबों को बाँधें?
मैं नहीं मानती उस समाज की परिभाषाएँ,
जो मेरे सपनों की हदें तय करता है,
जो ख़ुद को सौ ग़लतियाँ करने की छूट देकर,
मेरे एक फ़ैसले पर चरित्र की बातें करता है।
मेरी नज़र में इज़्ज़त उस चरित्र की है,
जो सच के साथ खड़ा रहना जानता है,
जो दुनिया की आँखों में अच्छा दिखने से पहले,
अपनी नज़रों में सही रहना जानता है।
आज़ाद हूँ मैं, मुझे अपनी राह चुनने दो,
गिरूँ अगर कभी, तो ख़ुद ही सँभलने दो,
तुम्हारा काम है कहना, कहते रहो,
मुझे मेरी ज़िंदगी अपने ढंग से जीने दो।
क्योंकि ये ज़िंदगी मेरी है,
तो ख़्वाब भी मेरे होंगे, फ़ैसले भी मेरे होंगे,
तुम्हारी सोच की सीमाओं में क़ैद नहीं मेरा वजूद,
मेरे कल के रास्ते अब मेरे ही चुने होंगे।
मैं लड़की हूँ, कोई सवाल नहीं जिसका जवाब समाज देगा,
मैं एक इंसान हूँ, मेरा भी अपना एक ख़्वाब होगा,
और जिस दिन मैंने ख़ुद के लिए खड़े होना सीख लिया,
उस दिन मेरे फ़ैसलों का गवाह सिर्फ़ मेरा आत्मसम्मान होगा।
— भारती शर्मा