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बेपरवाह थे हम

Bajrang Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी बेपरवाह होकर गलियों में घूमे,
        
                                                    
                            
फिर कंधों पे भारी बस्ते सजाने लग गए।
ख्वाबों के पीछे भागे कुछ इस कदर,
कि खुद को काबिल बनाने लग गए।
एक बार जो निकले थे घर की चौखट से,
फिर लौटने में हमें ज़माने लग गए।
माँ के हाथ का निवाला पीछे छूटा,
जब दूर शहर में छोटे से कमरे बसाए।
रात-रात भर जागकर किताबों के साथ,
उम्मीदों के न जाने कितने दीये जलाए।
बचपन की वो बेफिक्री कहीं खो गई,
हम वक्त के साथ खुद को आज़माने लग गए।
एक बार जो निकले थे घर की चौखट से,
फिर लौटने में हमें ज़माने लग गए।
पढ़ाई मुकम्मल हुई तो कमाने की फिक्र आई,
जिम्मेदारियों ने चुपके से कंधा थाम लिया।
नौकरी, दफ्तर और हिसाब-किताब के बीच,
सपनों ने भी जैसे नया मुकाम लिया।
त्योहार भी अब चंद छुट्टियों में सिमट गए,
हम कागज़ के टुकड़ों के पीछे दिन बिताने लग गए।
एक बार जो निकले थे घर की चौखट से,
फिर लौटने में हमें ज़माने लग गए।
माँ फोन पर हर बार पूछती है—"घर कब आओगे?",
बाबूजी की खामोशी में भी एक इंतज़ार रहता है।
हम हर दफा कह देते हैं—"बस अगली छुट्टी पर",
पर परदेस में हर रोज़ कोई नया काम रहता है।
जिस घर के आँगन में कभी राजा की तरह खेले,
वहीं जाने के लिए अब तारीखें मिलाने लग गए।
शहर की इस भीड़ में सब कुछ हासिल किया,
मगर वो सुकून की छाँव कहीं खो गई।
पहले घूमने, फिर पढ़ने, फिर कमाने लग गए,
एक बार घर से निकले, तो लौटने में ज़माने लग गए।
2 महीने पहले
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