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कांवड़ यात्रा

Babu Ratanpura

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कांधे पर कांवड़ साजे,
        
                                                    
                            
मुख पर 'हर-हर महादेव' का नाम,

एक तरफ है निश्छल भक्ति,
एक तरफ केवल शो-शा का काम।

असली वह जो नंगे पांव,
मीलों दूर पैदल चलता है।

पांवों के छालों में भी,
जिसका विश्वास न ढलता है।

जल गंगा का लाकर जो,
शिव पर श्रद्धा से ढारता है,

बिना प्रदर्शन, शांति भाव से,
अपने ईश्वर को पुकारता है।

त्याग, तपस्या, प्रेम, नियम,
यह असली रूप भक्ति का है।

नकली वह जो डीजे के शोर में,
अपनी ही धुन में खोए हैं।

भक्ति पीछे छूट गई,
दिखावे के बीज संजोए हैं।

हुड़दंग, प्रदर्शन, भारी भीड़,
सड़कों पर रुतबा जमाना,

भोले के नाम की आड़ में,
दूसरों को परेशान करना।

जहाँ न संयम, न कोई मर्यादा,
वह रूप केवल छल का है।

सार यही है...

कांवड़ नहीं नकली या असली,
असली-नकली तो मन होता है।

निष्काम भाव से जो बह जाए,
वही सच्चा सावन होता है।

जल चढाओ तो श्रद्धा से,
अहंकार को दूर हटाकर,

शिव तो बस भाव के भूखे हैं,
मन को थोड़ा सा झुकाकर।

 
एक महीने पहले
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