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सँभाल रखा है आँखों में इक निशानी को।

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सँभाल रखा है आँखों में इक निशानी को।
        
                                                    
                            
बहा न पाऊँगा अश्कों की इस रवानी को।

समेट लाया हूँ आँखों में उसकी यादों को,
चला हूँ ढूँढने फिर अपनी ज़िंदगानी को।

वो एक पल था जो सदियों के फ़ासले जैसा,
मैं रोक ही न सका वक़्त की रवानी को।

वो चुप रहा तो बहुत कुछ कहा निगाहों ने,
मैं पढ़ न पाया मगर उसकी बे-ज़बानी को।

मैं उसके बाद भी दुनिया में मुस्कुराता रहा,
मगर छुपा न सका दिल की उस वीरानी को।

न जाने किस लिए दरिया के पास बैठा हूँ,
मैं जानता हूँ कि पीना नहीं है पानी को।
- अज़हर साबरी
एक महीने पहले
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