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नींद आँखों से जाती रही...

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नींद आँखों से जाती रही रात भर।
        
                                                    
                            
चाँद बनकर वो आती रही रात भर।

कोई आहट न आई दरीचे तलक,
दिल को दुनिया रुलाती रही रात भर।

सूनी गलियों में फिरता रहा चाँद भी,
चाँदनी दिल जलाती रही रात भर।

बात दिल की ज़ुबाँ तक जो आई नहीं,
बेबसी सर झुकाती रही रात भर।

ख़ामुशी चीखती थी हर एक सम्त से,
बे-रुखी गुनगुनाती रही रात भर।

वक़्त के साथ चलना था लाज़िम मगर,
उम्र पीछे बुलाती रही रात भर।

ज़िंदगी की हक़ीक़त से टकरा के हम,
बे-कसी मुस्कुराती रही रात भर।

इक पुराने फ़साने की खुशबू लिए,
याद दिल को सताती रही रात भर।

सच की दीवार कमज़ोर होती नहीं,
झूठ दुनिया सजाती रही रात भर।

टूट कर भी बिखरने न दी आन को,
शम्अ' ख़ुद को जलाती रही रात भर।

- अज़हर साबरी
5 दिन पहले
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