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तुम्हारा असर

Astitwa Agarwal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो आगोश-ए-सुकून में हैं, और यहाँ कोई चैन गँवाने लगा है,
        
                                                    
                            
जो बस मुँह धो कर निकलता था, वो नादान अब खुद को सजाने लगा है।

एक शख्स ने ज़िंदगी को इस क़दर मुतास्सिर किया है आख़िर,
फ़क़त काम से मतलब रखने वाला, दफ़्तर के बाद वक़्त बिताने लगा है।

किसी की एक आवाज़ पे तय कर बैठे हैं अब अपना हँसना और रोना,
ख़ुमार-ए-इश्क़ अब इस क़दर उस दीवाने पे छाने लगा है।

रोज़ शाम उनसे मिलने के इंतज़ार में हाल कुछ यूँ है अपना,
कि आसमान पे ठहरा हुआ सूरज भी अब हमें सताने लगा है।
एक महीने पहले
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