विज्ञापन

मजलूमों कों कभी तुम सताना नहीं

Ashutosh Amit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरसों तक रूम में जाग-जाग,
        
                                                    
                            
भरी हमने खुद में इतनी आग।
सुख-दुख को सहता रहा अनवरत,
न जाने किये हमने कितने त्याग।
पर हाय तेरी बहरी सरकार,
किया पेपर लीक लीक बार-बार।
है तेरी महिमा अपरम्पार,
चाहे हो जिसकी सरकार।
पेपर लीक होता हर बार,
पढ़ने वालों को मिला ठेँगा।
नौकरी रही न गरीब द्वार,
आखिर छात्र करें कब तक त्याग।
हे 'महामानव' तू बतला दे अब,
तेरे दर पर आए 'हम'।
अपना हलफनामा ले आये हम,
कितने अनशन - कितने आन्दोलन।
सब व्यर्थ रहा सुन जनार्दन,
न लगाये नारे बार-बार।
इंकलाब जिंदाबाद - २
पर हमें मिला बस लाठी और जेल,
अबला, बालक और वृद्ध सब बेकार।
ज्ञानी, ध्यानी और योगी भी सब,
सब कर रहे हैं चीख-पुकार।
तूने भी न सुनी तो कौन सुने,
छात्रों की यह करुण पुकार।
— अमित
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

TATA VENKAT SRINIVAS

28 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10397 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

417 कविताएं

View Profile