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तूफ़ानी शोर

Aryan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आसमान पर छाई घटा, जैसे कोई गहरा राज़ है,
        
                                                    
                            
सन्नाटे को चीर रही है, हवाओं की ये आवाज़।
उठ रही है धूल की चादर, धुंधला गया है रास्ता,
आज प्रकृति दिखा रही है, अपना रौद्र अंदाज़।
पेड़ों की शाखाएँ कांप रही हैं, डर से या फिर जोश में?
परिंदे सारे दम साध कर, बैठे हैं अपने होश में।
घर के दरवाज़े खट-खट करते, जैसे कोई दस्तक हो,
आंधी ने ये ठान लिया है, कि हर कोई अब सतर्क हो।
मिट्टी की वो सोंधी खुशबू, अब तूफ़ानी धूल हुई,
गुज़रे वक़्त की यादें जैसे, पन्नों में महफ़ूज़ हुईं।
थम जाएगा ये शोर ज़रा सा, ढल जाएगी ये रात,
बस इंतज़ार है उस पल का, जब बरसेगी बरसात।
एक महीने पहले
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