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जनता पूछ रही है

Arjun

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            महलों में उत्सव है,गलियों में सन्नाटा।
        
                                                    
                            
सत्ता के चेहरे पर मुस्कान है,जनता के चेहरों पर थकान।
शिक्षा का मंदिर,अब बाज़ार बन गया।
ज्ञान का दीपक,अवसरों में खो गया।
डिग्रियों का भार,कंधों पर है।
रोज़गार फिर भी,काग़ज़ों पर है।
भर्ती की राह,इतनी लंबी क्यों है?
हर आशा,अधूरी क्यों है?
फ़ाइलें मुस्काती हैं,रिश्वत बोलती है।
ईमानदारी रोज़,आँसू ढोती है।
सवाल दबे हैं,शोर बहुत है।
सच आज भी,कितना मौन है।
जनता भूखी,भाषण भारी।
वादे मधुर,नतीजे खोखले।
इतना कहना,याद रहे—
राजसिंहासन टिकते नहीं,जनमत बिकते नहीं।
और इतिहास की आदत है—वह ताली नहीं,हिसाब लिखता है।
3 महीने पहले
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