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बदल जाते हैं रहबर

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ दर्द जो ज़ुबां से बयां नहीं होते
        
                                                    
                            
फकत एहसास होता है रूह को चुभन का
वक्त मरहम नहीं बनता कभी नासूर का
दवा भी दर्द ही देती है हरदम दिलजलों को
कोई मगरूर हो कितना भी दिल जानता है
दर्द का एहसास होते ही आंखों से आंसू
ढुलक जाते हैं खामोशी से अक्सर
बयां करना बहुत मुश्किल है सबकुछ
चंद लम्हों में बदल जाते हैं रहबर
यहां कोई नहीं अच्छा बस दिखावा है
वही डंसते हैं जो आस्तीनों में छिपे हैं
3 महीने पहले
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Prasoon Saxena

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