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फिर किसी नई अधूरी कहानी को

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह झूला
        
                                                    
                            
जाने कितनी अधूरी कहानियों को
अपने साथ झुलाता रहा है…

कभी चाय की एक सुनहरी शाम,
तो कभी किसी किताब से
एक पहली मुलाक़ात।

कभी मौन का एक गहरा समंदर,
कभी उफ़नते हुए मन के विचार।

कभी महत्वाकांक्षाओं की ऊँची उड़ान,
कभी अपने सफ़र को
एक ठहराव पर देखने की चाह।

कभी बहते हुए आँसुओं को
जानने का कारण,
कभी चेहरे पर उस मद्धम हँसी का राज।

कितनी कविताएँ,
कितनी कहानियाँ
लिखी गईं जीवन की,
कितनी अधूरे प्रेम की बातें हुईं।

कितने अपनों के इंतज़ार हुए,
कितने अगल-बगल के लोगों के
दुख-सुख साझा हुए।

पीछे रसोई की खिड़की से
आती रहीं
अनगिनत खानों की ख़ुशबू।

दो लोगों के संवाद की जगह
कभी बस एक खिड़की रही—
हल्के नीले-भूरे रंग की।

और उसके पार
खुला नीला अंबर,
जो अपने प्रकाश से
हर बार
थोड़ी-सी रोशनी
इस झूले तक ले आता रहा।

इस झूले की उम्र भी
उतनी ही है
जितने उसके आसपास के लोग
और उनकी स्मृतियाँ।

कभी किसी ने इसे रंग दिया,
तो कभी किसी ने इसे सजा दिया।

किसी ने इसके पुरानेपन को छुआ,
किसी ने इसकी चरमराहट में
अपनी हँसी मिला दी।

किसी ने इसके भीतर के मौन को
शब्दों में पिरो दिया,
तो किसी ने उन शब्दों के बीच
अपनी कोई अधूरी बात छोड़ दी।

किसी के आने की आहट,
किसी के जाने की ख़ामोशी,
किसी के लौट आने की उम्मीद—
सब कुछ
इसने अपने भीतर
कहीं सहेज लिया।

यह सफ़ेद झूला
जिसकी अब
अपनी भी एक कहानी है।

कहानी उन लोगों की,
जो इस पर बैठकर
कुछ देर के लिए
अपनी दुनिया से दूर हुए।

कहानी उन बातों की
जो कही नहीं गईं,
उन रिश्तों की
जो पूरे नहीं हुए,
और उन स्मृतियों की
जो कभी पूरी तरह गई ही नहीं।

अब भी यह झूला
धीरे-धीरे हिलता है…

हवा आती है,
खिड़की के परदे को छूकर गुजरती है,
रसोई से कोई ख़ुशबू चली आती है,
और नीला अंबर
चुपचाप अपनी रोशनी
इस पर रख देता है।

शायद कोई फिर आएगा,
कुछ देर बैठेगा,
कुछ कहेगा,
कुछ चुप रहेगा…

और यह सफ़ेद झूला
फिर किसी नई अधूरी कहानी को
अपने साथ
झुलाता रहेगा।
13 घंटे पहले
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