कुछ भी कहने से हम कतरा रहे हैं
वो बेख़ौफ़ होकर कहे जा रहे हैं।
गर्दिश में जिनको दिया था सहारा
वही हाथ छोड़े चले जा रहे हैं।
वफाओं की जिनसे थी उम्मीद हमको
वो गम का सियापा दिए जा रहे हैं।
मेरी याद में जो बहाते थे आंसू
वही आज हम पर हंसे जा रहे हैं।
खुशियां बहारों की उनके हवाले
हम पतझड़ का मौसम जिए जा रहे हैं।
हमसे हमारी हकीक़त न पूछो
जिंदगी का ज़हर हम पिए जा रहे हैं।
दुःखों के समंदर में डूब रहा हूं
दूर हमसे किनारे हुए जा रहे हैं।
बीते दिनों को संजोया था हमने
आज बनकर पखेरू उड़े जा रहे हैं।
कई रातों तक जिनको जलना था 'अनुपम'
वो दीपक अभी ही बुझे जा रहे हैं।।
- अनुपम निशान्त