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पुराना ख़त (नज़्म)

Anmol Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल यूं ही अलमारी से तुम्हारा लिखा
        
                                                    
                            
एक ख़त निकल आया

जिसमें कुछ तुमने ज़्यादा नहीं लिखा था
तुम कैसे हो? कुछ ऐसा सवाल लिखा था

उसमें थीं वहीं पुरानी हाल-चाल की बातें
उल्फ़त में बिताए अपने माह-ओ-साल की बातें

बड़े ही सादा ज़ुबान में तुमने पूछा था
हां यही अपने बयान में तुमने पूछा था
मेरे काम, मेरे घर, मेरे हालात के बारे में
मोहब्बत के अनकहे सवालात के बारे में

तन्हाई में कटी रातों की बात थी उसमें
ख़ुद से की गई बातों की बात थी उसमें
उसमें बातें थीं ख़यालों की, अरमानों की
जो कभी न पूरे होंगे उन इमकानों की
(इम्कान: संभावनाएं)

तुम्हारे अश्क के छींटें अभी तक हैं उसमें
उसमें अभी तक उनकी महक बाकी है
शायद अब दिल में तेरे हों या न हों
पर उस ख़त में तेरी उल्फ़त की कसक बाकी है

मैं उस ख़त को लौह-ए-दिल समझता हूं
जिसके हर वरक पर हमारी उल्फ़त के
ना जाने कितने ही खिले-अनखिले गुलाब हैं
और मेरी हयात की तारीकी का
बस अब वही माहताब और आफताब हैं
(लौह-ए-दिल: दिल रूपी पन्ना; तारीकी: अंधेरा)

मैं कल से न जाने उसे कितनी ही बार पढ़ चुका हूं
सच कह रहा हूं, मैं उसे दीवानवार पढ़ चुका हूं
हर एक हर्फ़, जैसे घुल सी गई है मेरी सांसों में
वो एक ख़त कल से नाच रहा है मेरी आंखों में

लेकिन हां, एक बात ये है कि
वो जो लम्हें अपने माज़ी के भुला चुका था मैं
वो किस्से जिनको भुला चुका था मैं
अपनी उल्फ़त की वो हसीन राहें
जिन्हें पीछे छोड़कर हम कब का आगे बढ़ चुके हैं
अब ये ख़त मुझे वापस वहीं धकेल रहा है
कल से ये मेरे जज़्बात से खेल रहा है
तुम ही कहो, मुझे क्या करना चाहिए?
-अनमोल
एक महीने पहले
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