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सहज कुमार और काठमांडू

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            1992 में मैं नवलपरासी के
        
                                                    
                            
पाल्ही कैंपस में
अंग्रेजी भाषा पढ़ाने गया
1994 में मैं काठमांडू गया
शहर मेरे लिए था एक दम नया
काठ का अर्थ लकड़ी,मांडू मतलब घर
मिले काठ के अनेकों घर
हिंदी बोलते थे लोग फर्र फर्र
लगता था है हिंद का कोई शहर
पर नाक चिपटे,आंख घिचुर घिचुर
गोल अनुहार वाले लोग थे भरपूर
हिंदी पत्र, पत्रिकाएं थी भरपूर
सब जाता था दिल्ली से,वायु वान से
लोग देख रहे थे मुझे बड़े ध्यान से
सुन रहे थे मुझे लोग ओड़ कर कान से
धोती,मूंजी,गांठें कहकर
मधेशी,भारतीय कह कर
चिढ़ाने वालों की कमी नहीं थी
पर प्यार से बतियाने वालों की भी कमी नहीं थी
थी वहां संस्कृति खुली खुली,थे लोग दिलवाले
घूम रही थी छोरियां छोरों के गले में बाहें डाले
फैशन में थे वे खूब चूर
नेपाली गाने बज रहे थे प्रचुर
हिंदी के भक्ति के गाने भी खूब गूंजते थे
वे हमारे ही देवी देवता को पूजते थे
हिंद का बोलबाला था
बना मैं मतवाला था
ज्यादे भारतीय चीजों
कुछ चीन की चीजों
से पटा बाजार था
पशुपतिनाथ मंदिर में भीड़ अपार था
यदि चीन खेल न खेले
तो हों नहीं वहां झमेले
लगे वह शहर जैसे हिंद के मेले
चलो पड़ोसी को प्यार करें हम
पर हमेशा होशियार रहें हम
होशियारी से हमेशा हर कार्य करें हम।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
एक महीने पहले
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