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जनता की कुर्सी पर,बैठ ऐंठ तुम गए

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुर्सी जनता की, बैठ तुम गए
        
                                                    
                            
जनता की कुर्सी पर,बैठ ऐंठ तुम गए
कर दो खाली हमारी कुर्सी
बैठूं न बैठूं मैं, है हमारी कुर्सी
रहेगी खाली कुर्सी कब तक?
जनता जगती नहीं है जब तक
जनता आती नहीं है तब तक
जनता संभलती नहीं है तब तक
जनता पढ़ती नहीं है तब तक
जनता संगठित नहीं है तब तक।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
एक महीने पहले
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