विज्ञापन

विशेष बच्चों के माता-पिता

Anita Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पैदा हुई संतान तो उस दिन
        
                                                    
                            
खुशियों की दिवाली आई थी,
बरसों की सूनी चौखट पर
पहली किलकारी छाई थी।
माँ की आँखों में सपने थे,
पिता के मन में अरमान था,
बड़ा होकर बेटा सहारा बनेगा,
बस इतना-सा ही तो मान था।
पर किस्मत ने कुछ और लिखा था,
जिसे सहारा समझ बैठे थे,
वो नन्हे कंधे खुद ही
ज़िंदगी का भार उठाने वाले थे।
वक़्त बीता तो डॉक्टर ने
एक सच सामने रख दिया,
"यह बच्चा सामान्य नहीं है..."
सुनकर जैसे समय ठहर गया।
उस दिन से माँ की नींदें रूठीं,
पिता की हँसी कहीं खो गई,
हर सुबह एक नई उम्मीद बनी,
हर शाम आँखें नम हो गईं।
दूसरों के बच्चों के लिए
जो बातें पल भर में आसान थीं,
उनके बच्चे की हर छोटी कोशिश
कई बरसों की पहचान थी।
एक शब्द बोल दे,
एक कदम चल दे,
एक मुस्कान दे दे बस,
यही उनकी सबसे बड़ी जीत थी।
लड़ाई केवल बीमारी से नहीं,
समाज की सोच से भी लड़नी थी,
तानों, नज़रों और सवालों के बीच
अपने बच्चे की दुनिया गढ़नी थी।
उनकी बस इतनी-सी ख्वाहिश थी—
जब वो घर से बाहर निकले,
कोई उसे घूरे नहीं,
कोई उसे ठुकराए नहीं,
उसे भी उतनी ही आज़ादी मिले,
जितनी हर बच्चे का अधिकार है।
धीरे-धीरे अपने भी दूर हुए,
रिश्तों के चेहरे बदल गए,
जो हर खुशी में साथ खड़े थे,
वो भी वक्त के साथ आगे निकल गए।
तब समझ आया—
सच्चा सहारा केवल ईश्वर है,
बाकी तो सब
ज़रूरतों के रिश्तेदार हैं।
सफर कठिन था,
रास्ता लंबा था,
लेकिन हिम्मत ने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उस बच्चे ने
चलना भी सीखा,
संभलना भी सीखा,
और सबसे बढ़कर
ज़िंदगी को जीना सीखा।
आज भी उसकी हर मुस्कान में
माँ-बाप की पूरी दुनिया बसती है।
उनकी सबसे बड़ी दौलत
न धन है, न ज़मीन,
उनकी असली जमा-पूँजी
उनके बच्चे की एक छोटी-सी खुशी है।
सलाम है उन माता-पिता को,
जो बिना किसी शिकायत के
हर दिन एक नई उम्मीद जीते हैं।
और सलाम है उन विशेष बच्चों को,
जो हमें सिखा जाते हैं कि
जीतने के लिए तेज़ दौड़ना नहीं,
हिम्मत से चलते रहना ज़रूरी है।
-अनिता शर्मा 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Parul Bhaktani

1636 कविताएं

View Profile