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आज मदहोश हुआ मेरा मन

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज मदहोश हुआ मेरा मन,
        
                                                    
                            
न जामों से, न मधुशाला से—
तेरी स्मृति की मृदुल लहर ने
छू लिया है चुपके से।

आज हवा कुछ और लगी है,
फूलों की भाषा बदली है;
हर पत्ता तेरे नाम का
कोई गोपन मंत्र पढ़ा करता है।

बादल ने जब खोले केश,
धरती ने आँचल फैला दिया;
भीगी-भीगी इस ऋतु ने
मन का हर विराग बहा दिया।

तेरी आँखों की गहराई से
एक नील गगन उतर आया,
मेरे सूने अंतर्मन में
प्रेम का पहला दीप जलाया।

अब चाँद नहीं, तेरा मुख है;
अब रात नहीं, तेरा स्पर्श।
अब बूँद नहीं, तेरी पायल;
अब साँस नहीं, तेरा हर्ष।

आज मदहोश हुआ मेरा मन,
तेरे मौन के मधुर निमंत्रण से;
जैसे वीणा का कोई सोया स्वर
जाग उठा हो प्रथम स्पंदन से।

यह कैसी अनुपम मादकता है—
जिसमें होश भी उज्ज्वल लगते हैं,
और प्रेम की अग्नि में जलकर
सारे संशय निर्मल लगते हैं।

यदि यह स्वप्न है, तो टूटे नहीं;
यदि यह सत्य है, तो छूटे नहीं।
जीवन की अंतिम साँस तलक
तेरा अनुराग ही मेरा प्राण रहे।

आज मदहोश हुआ मेरा मन—
क्योंकि पहली बार लगा,
प्रेम किसी व्यक्ति का नाम नहीं,
ईश्वर की सबसे कोमल अनुभूति है।

-अनिता चतुर्वेदी
3 महीने पहले
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