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बस इतनी-सी बात

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बस इतनी-सी बात~
        
                                                    
                            

तुम सामने बैठी हो,
फिर भी बहुत दूर लगती हो,
एक ही कमरे में होकर भी
जैसे किसी और शहर में रहती हो।

तुम्हारी खामोशी
मोबाइल की बंद स्क्रीन जैसी है—
सब कुछ सामने है,
पर कोई संदेश नहीं आता।

मैं बार-बार सोचता हूँ,
आख़िर कहाँ चूक गया मैं?
किस छोटी-सी बात ने
तुम्हारे मन में इतना बड़ा तूफ़ान भर दिया?

तुम्हारे चेहरे पर गुस्सा कम,
उम्मीद ज़्यादा दिखाई देती है—
शायद चाहती हो
कि मैं तुम्हें समझूँ,
सिर्फ़ मनाऊँ नहीं।

मैंने आज
अपने सारे तर्क किनारे रख दिए हैं,
न कोई सफ़ाई दूँगा,
न अपनी जीत की कोशिश करूँगा।

बस हाथ जोड़कर
इतना कहना है—
रिश्ते बहस जीतने से नहीं,
एक-दूसरे को समझने से बचते हैं।

तुम्हें भी तो पता है,
हम दोनों परिपूर्ण नहीं हैं,
कभी मेरी आवाज़ ऊँची होती है,
कभी तुम्हारी चुप्पी गहरी।

मगर प्रेम का अर्थ
हर बार सही होना नहीं,
कभी-कभी
अपने प्रिय के दुख के आगे
चुपचाप झुक जाना भी है।

तो छोड़ो न,
यह रूठना, यह दूरी, यह मौन...
आओ आज फिर
बिना किसी शर्त के बात करें।

तुम अपनी शिकायत कहना,
मैं अपनी गलती मान लूँगा—
और अगर फिर भी
आँखों में आँसू आ जाएँ,
तो उन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं होगी।

क्योंकि कुछ रिश्ते
‘सॉरी’ से नहीं सँवरते,
बस एक सच्ची नज़र,
एक स्पर्श
और थोड़े-से प्रेम से
फिर से जीवित हो जाते हैं।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
7 घंटे पहले
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