किसको फुरसत थी,या कुव्वत थी गिराता हमको
अपनी गफलत से गिरे, फिर भी उठाता हमको
उसने तो जाने पर इस्तकबाल तक भी न किया
अपनी हसरत थी कि पहलू में बिठाता हमको
अक्सर लोगों ने सही राह का पता भी न दिया
हमने चाहा कोई मंजिल तो दिखाता हमको
ख्वाब अच्छा भी न था वक्त और जाया हुआ
काश बे वक्त नींद से कोई तो जगाता हमको
यूं बुलाकर के फिर बेरुखी का क्या ये मतलब है
हमने भी कब चाहा था कि कोई बुलाता हमको