विज्ञापन

हर सांस इम्तिहाँ

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढूंढता तो हूं सकून ए दिल कहां कहां
        
                                                    
                            
कहीं भी रुक नहीं सका है ये कारवां
मेरे ख्याल ही थे ठहरे रुके रुके से
वर्ना ये कायनात थी हरदम रवां रवां
हम उम्र की चादर को ओढ़े हुए अभी
मूंदे हैं आंख कितने,नजारे जवां जवां
वो आग बुझ गई है,रह गईं निशानियां
उठ रहा है आज भी उदास सा धुआं
गुजरी बयार लौटकर आती नहीं कभी
कुछ याद में, सदमे में डूबा है गुलिस्तां
रखता है कौन याद पुरानी कहानियां
किस्से नए सुनते हैं अब तो जुबां जुबां
क्या जुर्म हुआ है,या कोई खता हुई
दिल रोज सुना करता है मेरा वही बयां
होता जो इख्तियार, तो दुनिया में न आते
लेती है जिंदगी यहां हर सांस इम्तिहाँ
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anshika Raina

2 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11079 कविताएं

View Profile

Indra Prasad

583 कविताएं

View Profile

Rabindra Aman

129 कविताएं

View Profile