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क्यों ना अब आत्मसम्मान का दीप जलाया जाए।

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम गिरते रहे, वे गिराते रहे,
        
                                                    
                            
यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।
हमारा मस्तक उनके चरणों में
विनम्रता से सदा झुकता रहा।

फिर एक दिन स्वाभिमान ने पुकारा—
"मेरा सिर कोई फुटबॉल नहीं,
जिसे जब चाहे ठोकरों से उछाला जाए।"
क्यों ना अब आत्मसम्मान का दीप जलाया जाए।

बरसों की गुलामी का संस्कार
रक्त में कहीं न कहीं समाया रहा,
इसी कारण अन्याय सहते रहे,
यही उसका परिणाम रहा।

सम्मान करना हमारी संस्कृति है,
पर वह परस्पर सदैव समान होना जरूरी है।
जहाँ दोनों ओर आदर हो,
वहीं सच्चा सद्भाव जन्म लेता है।

हमें किसी से राग नहीं, न द्वेष है,
दुनिया में अनेक प्रकार के लोग हैं।
जो भी मिला, मुस्कुराकर मिला,
हमने प्रेम और सम्मान से ही उत्तर दिया।

किन्तु जो किसी को झुकाकर
स्वयं को बड़ा सिद्ध करना चाहते हैं,
वह मानवतावादी नहीं,
दानववादी सोच का परिचायक है।

स्वाभिमान अहंकार नहीं होता,
और विनम्रता कभी गुलामी नहीं होती।
सम्मान वही सार्थक है,
जो मानवतावादी समानता का समर्थक है।
-अनिल सोनी-कुरवाई
2 महीने पहले
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